शिक्षा नीति नई ‘नोटबंदी’, होगे दूरगामी असर

कृष्ण कांत

विदेशी विश्वविद्यालयों को भारत में कैंपस खोलने की अनुमति देकर हम ‘आत्मनिर्भर’ बनने जा रहे हैं. नागरिकों को आत्मनिर्भर बनने की सलाह देने वाली सरकार अपने ​बच्चों को पढ़ाने के लिए निजी शिक्षा कंपनियों पर निर्भर होगी.

स्वदेशी की पक्षधर बीजेपी और आरएसएस की सरकार ने तय किया है कि अब विदेशी विश्वविद्यालय भारत में अपने कैंपस खोलेंगे.

कुछ ही दिन पहले देश में ऐतिहासिक संकट के चलते पलायन हो रहा था, लोगों को सरकार की जरूरत थी, तब प्रधानमंत्री ने कहा था कि ‘आत्मनिर्भर’ बनना है.

जब यूपीए सरकार ने विदेशी विश्वविद्यालयों को भारत में लाने की तैयारी कर रही थी, तब बीजेपी इसके विरोध में थी. अब बीजेपी सरकार ने खुद ही विदेशी विश्वविद्यालयों के लिए भारत का दरवाजा खोल दिया है.

इसका अर्थ ये है कि शिक्षा का निजीकरण होगा. शिक्षा चिप्स और चुरमुरे की तरह एक बाजारू उत्पाद होगी. विदेशी विश्वविद्यालयों के आने का ​अर्थ है कि जिसके पास ज्यादा पैसे होंगे, वह खरीदेगा.

दुनिया की टॉप 200 यूनिवर्सिटीज में कभी कभार जेएनयू वगैरह की चर्चा होती रही है. अब सरकार ने तय किया है कि अब जेएनयू, आईआईटी और आईआईएम जैसे संस्थान स्वायत्त होंगे. यानी अब सरकार इनका वित्तीय खर्च उठाने की जिम्मेदारी इन्हीं पर छोड़ेगी. इन संस्थानों में एक बोर्ड ऑफ गवर्नर होगा जो वित्तीय, अकादमिक और प्रशासनिक मामले देखेगा. यूजीसी को खत्म कर दिया जाएगा.

नई शिक्षा नीति की पहली और सबसे बड़ी खामी ये है कि जो सरकार अपने सारे कामकाज अंग्रेजी में करती है, वह अंग्रेजी को विदेशी भाषा मान रही है.

पांचवी तक मातृभाषा या क्षेत्रीय भाषा को पढ़ाई का माध्यम बनाने की बात कही गई है. इसे आठवीं तक बढ़ाया जा सकता है. आप अंग्रेजी सीखना शुरू करेंगे पांचवी या आठवीं के बाद. यह हमारे छात्रों को पीछे ले जाएगा. सरकार एक तरफ सब प्राइवेटाइज कर रही है, दूसरी तरफ ग्लोब्लाइजेशन के इस दौर में बच्चों को अंग्रेजी से दूर कर रही है.

अंग्रेजी का इतिहास जो भी हो, लेकिन आज वह विश्व भाषा है. उसका महत्व न होता तो खुद प्रधानमंत्री गलत अंग्रेजी में भाषण देने की कोशिश करके अपना मजाक न बनवाते.

खबरें हैं कि आरएसएस से जुड़े कई लोग ड्राफ्टिंग की प्रक्रिया में शामिल थे. उनके साथ बैठकें हुईं और उनकी कुछ सलाह को मान लिया गया है. चुनाव लड़ी है भाजपा, जनादेश मिला है भाजपा को और नीतियां बना रहा है आरएसएस. ये एक अलग विचित्र मसला है.

कुल मिलाकर बिना सलाह ​मशविरा के, बिना संसद में चर्चा के, बिना शिक्षाविदों की सलाह के बनाई गई शिक्षा नीति नई ‘नोटबंदी’ है. इसका भी दूरगामी असर काफी मारक होगा.

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