‘विंस्टन चर्चिल भारतीयों को तुच्छ समझता था, गांधी और नेहरू को भी’

कृष्णकांत

1945 में लंदन में संयुक्त राष्ट्र की असेंबली का पहला सत्र आयोजित हुआ। इंडियन डेलीगेशन की अगुआई कर रही थीं नेहरू की बहन विजयलक्ष्मी पंडित। सत्र के दौरान चर्चिल उनके बगल बैठे थे। अचानक चर्चिल ने विजयलक्ष्मी पंडित से पूछा, ‘क्या आपके पति को हमने नहीं मारा? सच में हमने नहीं मारा?’

विजयलक्ष्मी पंडित के पति रणजीत सीताराम पंडित की जेल में मौत हो गई थी। चर्चिल इसी बारे में बात कर रहा था। विजयलक्ष्मी पंडित सकपका गईं, लेकिन थोड़ा सोचकर बोलीं, ‘नहीं, हर आदमी अपने निर्धारित वक्त तक जिंदा रहता है।’

हालांकि, इस जवाब के बाद दोनों में मित्रवत व्यवहार हुआ। बाद में चर्चिल ने विजयलक्ष्मी पंडित से कहा, ‘तुम्हारे भाई जवाहर लाल ने मनुष्य के दो दुश्मनों पर विजय पा ली है, नफरत और डर, जो कि मनुष्य के बीच सर्वोच्च सभ्य दृष्टिकोण है और आज के माहौल से गायब है।’

इसके कुछ समय बाद नेहरू महारानी के राज्याभिषेक में शामिल होने लंदन गए। समारोह खत्म हुआ तो संयोग से वहां नेहरू और च​र्चिल ही बचे, बाकी लोग चले गए। चर्चिल नेहरू की तरफ घूमे और कहा, ‘मिस्टर प्राइम मिनिस्टर, यह अजीब नहीं है कि दो लोग जिन्होंने एक दूसरे से बेहद नफरत की हो, उन्हें इस तरह से एक साथ फेंक दिया जाए?’

नेहरू ने जवाब दिया, ‘लेकिन मिस्टर प्राइम मिनिस्टर, मैंने आपसे कभी नफरत नहीं की।’

चर्चिल ने फिर कहा, ‘लेकिन मैंने की, मैंने की।’

फिर उसी शाम डिनर पर चर्चिल ने नेहरू के लिए कहा, ‘यहां एक ऐसा आदमी बैठा है जिसने नफरत और डर को जीत लिया है।’

1945 में चर्चिल को ब्रिटेन की जनता से सत्ता से उखाड़ फेंका। 47 में भारत आजाद हो गया।

Judith Brown किताब Nehru: A Political Life कहती है कि आजादी के बाद 1948 में जब चर्चिल की नेहरू से मुलाकात हुई तो ​चर्चिल ने भारत की आजादी का विरोध करने के लिए नेहरू से माफी मांगी थी।

जब तक ​चर्चिल को समझ में आया कि भारत की आजादी की लड़ाई की अगुआई करने वाले गांधी और नेहरू क्या चीज हैं, तब तक देर हो चुकी थी।

(संदर्भ: प्रोफेसर विश्वनाथ टंडन, टेलीग्राफ)

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