कश्मीर का एक गांव, जहां दहेज लेने वालों को नहीं नसीब होती गांव की कब्र

रिजवान शफी वानी/ श्रीनगर

ये दौलत के भूखे रिवाजों की दुनिया/ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है

साहिर लुधियानवी का यह नगमा मध्य कश्मीर के बाबा वेल गाँव में सच होती है जहां अज्ञानी और गैर-इस्लामी रीति-रिवाजों और प्रथाओं को त्यागकर विवाह समारोह किया जाता है. बाबा वेलगांव श्रीनगर से लगभग 30 किमी दूर मध्य कश्मीर के गांदरबल जिले में स्थित है. इसे कश्मीर का ‘दहेज मुक्त गांव‘ भी कहा जाता है.

गांव की आबादी 1500 से ज्यादा है. उनका मुख्य व्यवसाय अखरोट की खेती और पश्मीना शॉल की बुनाई है. ग्रामीणों का मानना ​​है कि दहेज जैसा अभिशाप न केवल समाज को नष्ट करता है बल्कि अटूट रिश्तों के बंधन को भी तोड़ता है और परिवारों को नष्ट कर देता है.

कश्मीर के अन्य हिस्सों में, हालांकि पश्चिमी परंपराओं को बढ़ावा देकर शादी पर लाखों रुपये खर्च किए जाते हैं, यह पूरी घाटी में एकमात्र गांव है जहां दहेज पर प्रतिबंध लगा दिया गया है और यह पूरे कश्मीर के लिए एक उदाहरण है.

यदि गांव में कोई परिवार दहेज न देने की इस परंपरा अर्थात दहेज की मांग का उल्लंघन करता है तो उसका सामाजिक बहिष्कार किया जाता है. इकरा बानो इसी गांव की रहने वाली हैं. इस क्षेत्र में जुलाई 2021 में इनकी शादी हुई थी. उसके पास विश्वविद्यालय से मास्टर डिग्री है. आवाज-द वॉयस से बात करते हुए इकरा बानो ने कहा कि उन्होंने जुलाई, 2021 में बहुत ही आसानी से शादी कर ली. वह कहती हैं, “मेरी शादी गांव वालों के वैध तरीके से हुई. मुझे गांव की इस परंपरा पर बहुत खुशी और गर्व है.”वह कहती हैं कि ऐसा नहीं है कि गांव के लोग गरीब हैं और इसलिए वे साधारण तरीके से शादी कर लेते हैं. ग्रामीणों ने तय कर लिया है कि क्या करना है और क्या नहीं करना है. यहां के लोग भी अमीर हैं, उनके पास काफी अच्छी संपत्ति है. लेकिन यहां हम गैर-इस्लामी रीति-रिवाजों को छोड़ देते हैं और सरलता से शादी कर लेते हैं, ताकि हर गरीब लड़की की शादी हो सके और एक समृद्ध जीवन जी सके.”

इस फैसले से गांव के सभी लोग खुश हैं. अभी तक घरेलू हिंसा की एक भी घटना नहीं हुई है. दहेज देने और लेने की परंपरा को युवा पीढ़ी का पुरजोर समर्थन है. युवाओं के सहयोग से ही यह परंपरा कायम है.

इकरा के मुताबिक, “कश्मीर में हजारों लड़कियां दहेज के कारण बूढ़ी और बर्बाद हो चुकी हैं. दहेज को लेकर माता-पिता चिंतित हैं. कई माता-पिता भी हैं जो दहेज के लिए पैसे जुटाने के लिए कर्जदार हैं. मैं कश्मीर के साथ-साथ पूरी दुनिया में दहेज लेना और देना बंद करना चाहती हूं.”

कहा जाता है कि आज से साढ़े सात सौ साल पहले सूफी संत सैयद बाबा अब्दुल रज्जाक इस्लाम का प्रचार और प्रचार करने बगदाद से कश्मीर आए थे और वे इसी इलाके में रहे.

यह उनका अंतिम विश्राम स्थल भी है, शायद इस बुजुर्ग की शिक्षाओं का प्रभाव अभी भी इस क्षेत्र में मौजूद है कि क्षेत्र के लोग सामाजिक कुरीतियों, अंधविश्वासों और फिजूलखर्ची से मुक्त हैं. मौलवी बशीर अहमद शाह इस गांव के मूल निवासी हैं. वह पिछले 30सालों से स्थानीय जामा मस्जिद में इमाम की ड्यूटी कर रहे हैं.

वह आवाज-द वॉयस से बातचीत में कहते हैं, “यहां के लोगों ने सर्वसम्मति से दहेज पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया है. इसके लिए हमने औपचारिक रूप से एक दस्तावेज तैयार किया है जिस पर गांव के बुजुर्गों और संवेदनशील लोगों के हस्ताक्षर हैं. 2021 में लोगों ने एक साथ एक और पेपर तैयार किया है.”

मौलवी बशीर अहमद के अनुसार, “अल्लाह सर्वशक्तिमान पवित्र कुरान में कहता है कि बर्बाद मत करो, अल्लाह को फिजूलखर्ची पसंद नहीं है.हमने देखा है कि समाज बिगड़ रहा है.

फैशन, पाखंड, फिजूलखर्ची और गैर-इस्लामिक रीति-रिवाजों का चलन बढ़ रहा है, इसलिए हमने एक बैठक बुलाई जिसमें बड़े-बुजुर्ग और नेकदिल लोग शामिल हुए और हमने इस बैठक में फैसला किया कि इस दहेज के लिए हम सभी को मिलकर काम करना चाहिए. इसे दूर करने और पूरी तरह से खत्म करने के लिए एक दस्तावेज तैयार करेगा. और सब मान भी गए.”

गौरतलब है कि ग्रामीणों ने दस्तावेज की एक प्रति जिला विकास आयुक्त और तहसील कार्यालय के कार्यालय में भी जमा की है, जिसमें औपचारिक रूप से कहा गया है कि ‘किसी भी व्यक्ति को दुल्हन के परिवार से आभूषण, टेलीविजन, रेफ्रिजरेटर, कपड़े और अन्य सामान का माँग करने का अधिकार नहीं है.

दस्तावेज में यह भी कहा गया है कि दूल्हे के पिता को 50,000 रुपये दूल्हे को देने होंगे, जिसमें से 20,000 रुपये निर्धारित किए गए हैं और शेष 30,000 रुपये दुल्हन के लिए कपड़े और अन्य जरूरतों को खरीदने के लिए रखे गए हैं.

बशीर अहमद शाह का कहना है कि यह दस्तावेज वर्ष 2004 में तैयार किया गया था. इस पर स्थानीय इमामों, बुजुर्गों और गांव के बुजुर्गों ने हस्ताक्षर किए हैं और उन्होंने प्रतिज्ञा की है कि वे न तो दहेज स्वीकार करेंगे और न ही देंगे. अब तक हम इसके लिए प्रतिबद्ध हैं.

बशीर अहमद शाह के मुताबिक, “गांव में हर कोई इस फैसले से संतुष्ट है. किसी घर में दंगा नहीं होता, झगड़ा नहीं होता. इस फैसले को सभी ने सहर्ष स्वीकार कर लिया है. किसी भी सास ने अपनी बहू से कभी नहीं पूछा कि वह अपने साथ क्या लेकर घर में आई थी?”

हालांकि अभी तक किसी ने भी इस फैसले का उल्लंघन नहीं किया है, लेकिन दस्तावेज के मुताबिक दहेज मांगने वालों का सामाजिक बहिष्कार किया जाता है.

मौलवी बशीर अहमद कहते हैं, “उस वक्त हमने यह भी तय किया था कि अगर कोई इस फैसले का उल्लंघन करता है तो उसका सामाजिक बहिष्कार किया जाएगा और उसे मस्जिद में प्रवेश नहीं करने दिया जाएगा और उसके परिवार में किसी की मौत हो जाएगी, तो मृतक को स्थानीय कब्रिस्तान में दफनाने की भी इजाजत नहीं.”

मौलवी बशीर अहमद चाहते हैं कि घाटी भर के लोग इस प्रथा को अपनाएं ताकि दहेज जैसे अभिशाप को मिटाया जा सके.

साभार: आवाज द वॉइस

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