गैर-मुस्लिम गांव के राजपूत मजार के संरक्षक, हिन्दू देते हैं अजान, मुख्तार ने मंदिर के लिए दी जमीन

आवाज-द वॉयस / पटना
बिहार के गया का विष्णुपद मंदिर विवाद इन दिनों सुर्ख़ियों में है. मगर यहां की गंगा-जमुनी तहजीब का कोई जवाब नहीं. गया जिले के केंदुई गांव में  एक प्रसिद्ध सूफी संत अनवर शाह शाहिद की दाता मजार इसकी मिसाल है. दिलचस्प बात यह है कि इस गांव में एक भी मुस्लिम परिवार नहीं है और यहां राजपूतों का वर्चस्व है और इस जाति के 500 से अधिक परिवार रहते हैं. यहां के राजपूत ही इस मजार की देखभाल करते हैं.
केंदुई निवासी सुनील सिंह ने कहा, “अनवर शाह शाहिद इस क्षेत्र के एक प्रसिद्ध फकीर थे और हमारे पूर्वजों के लिए उनके लिए बहुत सम्मान था. यह सम्मान एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचाया गया है और यह प्रथा भविष्य में भी जारी रहेगी. जब क्षेत्र में बारिश की कमी होती है, तो ग्रामीण बाबा अनवर शाह के सामने बारिश के लिए प्रार्थना करते हैं.”
एक अन्य निवासी राजेंद्र मोहन सिंह ने कहा, “इस मजार के लिए गांव के लोग काफी सम्मान करते हैं. गया और आसपास के जिलों से लोग मन्नते पूरी करने के लिए आते हैं और मजार में जाकर उनकी मनोकामनाएं जल्द ही पूरी होती हैं.” सिंह ने कहा, “हम हमेशा अपनी होली या दिवाली समारोह इसी जगह से शुरू करते हैं और फिर मंदिर जाते हैं. ग्रामीण भी इस मजार के रखरखाव के लिए धन इकट्ठा करते हैं.”
इसी तरह, माधी नालंदा जिले का एक और ऐसा गांव है, जहां दिन में पांच बार नमाज पढ़ी जाती है और हिंदू समुदाय के लोग 200 साल पुरानी मस्जिद से अजान देते हैं. माधी गांव के मूल निवासी राजीव स्वामी ने कहा, “हिंदू होने के नाते, हम नहीं जानते कि अजान या नमाज कैसे पढ़ी जाती है. इसलिए हमने उन्हें रिकॉर्ड किया है और उन्हें हर दिन निर्धारित समय पर बजाते हैं.” स्वामी ने आगे कहा, “हमें नहीं पता कि इस मस्जिद को किसने बनवाया था. चूंकि इस गांव में कोई मुस्लिम परिवार नहीं रहता था, इसलिए ग्रामीणों ने यहां की मरम्मत करने का फैसला किया और इसके रखरखाव के लिए तीन सदस्यीय टीम की प्रतिनियुक्ति की.”
एक अन्य महत्वपूर्ण घटनाक्रम में, गया जिले के बुद्धपुर गांव में, मुसलमानों ने 2018 में मंदिर निर्माण के लिए जमीन दान की थी. अब हिंदू समुदाय के लोगों ने उन्हें ‘सद्भावना मंदिर’ नाम के मंदिर में पूजा अर्चना करने के लिए बोला. इस मंदिर का इतिहास दिलचस्प है. ग्रामीणों के अनुसार, मुसलमानों ने बुद्धपुर में 10,000 से अधिक लोगों की आबादी का बहुमत बनाया. गांव में कई मस्जिदें थीं, लेकिन 2018 से पहले एक भी मंदिर नहीं था.
गांव में रहने वाले हिंदुओं की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी. फिर ग्रामीणों ने एक पंचायत बुलाई, जहां उन्होंने सर्वसम्मति से हिंदू परिवारों के लिए गांव में एक मंदिर बनाने का निर्णय लिया. मोहम्मद मुख्तार ने मंदिर के लिए जमीन दान की, जबकि ग्रामीणों ने इसके निर्माण के लिए धन जुटाया.

बुद्धपुर गांव के मूल निवासी इस्माइल खान ने कहा, “यह मंदिर हिंदू-मुस्लिम भाईचारे का प्रतीक है. मोहम्मद मोख्तार के सुझाव पर हमने इसका नाम सद्भावना मंदिर रखा. हम ‘भंडारा’ भी आयोजित करते हैं, जिसमें दोनों समुदायों के लोग भाग लेते हैं.” इस्माइल ने आगे कहा, “सांप्रदायिकता के सीमित पंख होते हैं, जो कुछ राजनीतिक दलों के भीतर फैलते हैं. समाज के बड़े तबके को शायद ही इसकी परवाह है. हम भाईचारे में विश्वास करते हैं और हमारे गांव ने इसे साबित कर दिया है.”

साभार: आवाज द वॉइस

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here