मुहर्रम ने भारतीय राष्ट्रवादियों को कैसे किया प्रेरित ?

साकिब सलीम

मुहर्रम या यौम-ए-आशूरा-दरअसल इस्लामी कैलेंडर के पहले महीने मुहर्रम के 10वें दिन को संदर्भित करता है. 680 ई. में इस तिथि को एक अत्याचारी शासक की एक बड़ी सेना ने पैगंबर मुहम्मद के नवासे हुसैन इब्न अली और उनके साथियों को मार डाला था. इराक के कर्बला में हुई घटना ने मुसलमानों को सदियों से सच्चाई और न्याय के समर्थन में अत्याचार के खिलाफ खड़े होने के लिए प्रेरित किया है.

यदि भारत पर विदेशी अंग्रेजी शासन निरंकुश न होता, तो क्या होता? इसमें कोई बेशक नहीं कि धर्मनिष्ठ मुसलमानों ने कर्बला में हुसैन के बलिदान की भावना के माध्यम से राष्ट्रवाद का संदेश दिया है.

1806में मुहर्रम मार्च के महीने में था. दक्षिण भारत में लोकप्रिय अंग्रेजी-विरोधी विद्रोह की गुप्त योजना राष्ट्रवादियों द्वारा रची जा रही थी. टीपू सुल्तान ने सात साल पहले ही श्रीरंगपटना के युद्धक्षेत्र में अपने प्राणों की आहुति दी थी. दिन महत्वपूर्ण था. मौलवियों ने देशभक्ति के संदेशों का प्रचार करने के लिए बंगलौर, नंदी हिल्स, वेल्लोर और अन्य शहरों में मुहर्रम की सभाओं का इस्तेमाल किया.

मुहर्रम के भाषणों का इस्तेमाल लोगों को यह बताने के लिए किया गया कि कैसे सच्चाई और न्याय के बीच की लड़ाई में हुसैन इब्न अली ने बुराई से समझौता करने पर मौत को चुना. इसके बाद टीपू सुल्तान को सच्चाई के ध्वजवाहक के रूप में एक समानांतर रखा गया, जिन्होंने हुसैन की तरह शहादत और अंग्रेजी सरकार को यजीद की तरह बुराई के रूप में चुना.

मुहर्रम की सभाओं और जुलूसों में गाने बनाए और गाए गए, जहां टीपू की प्रशंसा की गई, जबकि मीर सादिक और पूर्णिया की तुलना अंग्रेजों के खिलाफ युद्ध के दौरान टीपू की पीठ में छुरा घोंपने के रूप में की गई.

इन शहरों में तैनात सिपाही भारत के विभिन्न क्षेत्रों से थे. प्रत्येक भारतीय को आकर्षित करने के लिए इन गीतों की रचना कई भाषाओं में की गई. प्रत्येक भाषा में इन्हें सार्वजनिक स्थानों पर गाया गया.इन गीतों में टीपू की शहादत का बखान किया गया. टीपू की शहादत का मतलब सच्चाई की हार नहीं थी, बल्कि इसने पूरी दुनिया के सामने बुराई को उजागर किया था.

दो महीने बाद, भारतीयों ने इन शहरों में विद्रोह कर दिया. विभिन्न कारणों से विद्रोह सफल नहीं हो सका. मगर इसने 1857में बड़े पैमाने पर भविष्य के विद्रोह का खाका तैयार कर दिया.

( लेखक वरिष्ठ टिप्पणीकार हैं )

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