भारत में धर्मनिरपेक्षता के जनक मुगल शहजादा ‘दारा शिकोह’

भारतीय संविधान की प्रस्तावना की घोषणा के अनुसार भारत एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है। यानि भारत का कोई राष्ट्रीय धर्म नहीं है। लेकिन भारत सभी धर्मों का सम्मान करता है। धर्म और जाति आधारित यहाँ कोई भेदभाव नहीं किया जा सकता।लेकिन इन दिनों संविधान और धर्मनिरपेक्षता पर भी सबसे ज्यादा हमले हो रहे है। ऐसे में आज भारत में धर्मनिरपेक्षता के इतिहास के बारे में भी जानना आवश्यक हो गया। भारत सदियों से साधु-संतों की जन्मस्थली रहा। यहाँ हिन्दू-मुस्लिम सभी धर्मों के संतों ने जन्म लिया और जीवन भर प्रेम प्रेम का संदेश देते रहे। आज भी देश में उनके मजारों और समाधियों से ये संदेश जारी है। ऐसे ही एक शख्स है – मुगल शहजादा ‘दारा शिकोह’। ‘दारा शिकोह’ को भारत में धर्मनिरपेक्षता का जनक कहना गलत नहीं होगा।

दारा शिकोह मुगल बादशाह शाहजहां और उनकी सबसे चहेती पत्नी मुमताज़ महल के सबसे बड़े बेटे थे। कहा जाता है उनका जन्म शाहजहां द्वारा ख्वाजा मोइनूद्दीन चिश्ती की दरगाह में दुआ के बाद अजमेर के तारागढ़ किले में हुआ था। दारा शिकोह शाहजहां और मुमताज़ महल के सबसे प्रिय पुत्र थे। अपनी मां मुमताज़ महल की मृत्यु के पश्चात वह अपनी बहन जहांआरा के भी चहेते थे। दारा शिकोह अपने पिता शाहजहां के इतने करीब थे कि वह हमेशा उन्हे अपनी आँखों के सामने रखते थे। उन्हे किसी जंगी मोर्चे पर भी भेजने से भी वह परहेज करते थे। 

ऐसे में दारा शिकोह का ज़्यादातर समय किताबो में पढ़ने में ही व्यतीत हुआ। वह हमेशा अलग-अलग धर्मों के धर्मगुरुओं से घिरे रहते थे। अलग-अलग धर्मों के बारे में जानना, उनके बारे में गहन अध्ययन करना उनका रोजमर्रा का कार्य था। कहा जाता है कि ख्वाजा मोइनूद्दीन चिश्ती का उनके जीवन पर काफी प्रभाव था। इसलिए वह सूफी स्वभाव के थे। वह बहुआयामी प्रतिभा के भी धनी थे। वह एक विचारक, प्रतिभाशाली कवि, उच्च कोटि के धर्मशास्त्री थे। वह छोटी सी उम्र में ही सूफी रहस्य को खोजने में जुट गए थे। इसके लिए उन्होने कुरान का भी गहनता से अध्ययन किया। उन्होने 25 साल की उम्र में ही इस्लाम धर्म के पैगंबर हजरत मुहम्मद (सल्ल), उनके वंशज (अहले बेत), साथियों (सहाबा) और भारत के प्रमुख मुस्लिम संतों पर अपनी पहली किताब ‘सफ़ीनात-उल-औलिया’ लिख दी थी। वह सिलसिला ए कादरिया से जुड़े थे। उनके पीर मुल्ला शाह थे। इसके अलावा उन्होने ‘रिसाला-ए-हकनुमा’‘शाथियात या हसनत-गुल-आरिफिन’, ‘इक्सिर-ए-आज़म’, ‘जुग बशिस्त’ और ‘तर्जुमा-ए-अकवाल-ए-वासिली’ सहित कई किताबे लिखी। 

वह जीवन भर तौहीद (एकेश्वरवाद) के तहत वहदत-अल-वजूद (अस्तित्व की एकता) के रहस्य को खोजने में जुटे रहे। इसके लिए उन्होने हिन्दू धर्मों का भी अध्ययन किया। मुस्लिमों में हिन्दू धर्म की समझ बढ़ाने के लिए उन्होने कई हिन्दू धर्मग्रंथों, उपनिषदों, संस्कृत कृतियों का भी फारसी में अनुवाद कराया। कुछ इतिहासकारों ने ‘भगवद गीता’ के फारसी अनुवाद का श्रेय भी उन्हे ही दिया। उनके इस प्रयास से उपनिषद यूरोप पहुंचे और उनका लैटिन भाषा में अनुवाद हुआ जिसके बाद उपनिषदों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ख्याति मिली। हिन्दू धर्म में उनकी विशेष रुचि तपस्वी जीवन के रहस्य को जानने की थी। इस पर उन्होने ‘मजमा-उल-बहरेन’ नामक किताब लिखी। इस किताब में वह हिन्दू और इस्लाम धर्म का तुलनात्मक रूप से विश्लेषण करते है। इसके अलावा उन्होने ’सिर-ए-अकबर’ भी लिखी। जिसमे उपनिषदों के पचास अध्यायों का फारसी अनुवाद है।

शाहजहां अपने इस सूफी बेटे को तख्त ए हिन्दुस्तान पर बैठाना चाहते थे। उन्होने इसके लिए कोशिश भी की। लेकिन वे औरंगजेब के रहते कामयाब नहीं हो सके। कुछ इतिहाकार मानते है कि यदि दारा शिकोह हिंदुस्तान के बादशाह बन जाते तो देश की स्थिति कुछ अलग होती। कुछ इतिहाकारों का यहां तक मानना है कि दारा शिकोह की तख्त की जंग में हार से ही भारत में धार्मिक विभाजन की नींव पड़ी। जिसका खामियाजा 300 साल बाद पाकिस्तान के रूप में सामने आया।इतिहाकारों का कहना है कि दारा शिकोह हमेशा ही हिन्दू-मुस्लिम एकता के पक्षधर रहे। उन्होने अपने जीवन भर इस एकता को मजबूत करने का भी प्रयास किया। इसके लिए उन्होने दोनों धर्मों का अध्ययन कर कहा था कि कुरान और उपनिषद समानता का ही संदेश देते है। उपनिषदों का “सबसे बड़ा रहस्य” एकेश्वरवाद है। एकेश्वरवाद को ही कुरान में तौहीद कहा गया है। तौहीद शब्द वाहिद से आता है जिसका अर्थ है एक। ऐसे में दारा शिकोह को भारत में धर्मनिरपेक्षता का प्रवर्तक कहना गलत नहीं होगा।

(लेखक युवा पत्रकार और मानवाधिकार कार्यकर्ता है और इस्लामिक, मध्य पूर्व-खाड़ी देशों के मामलों में रुचि रखते है।)

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here