विश्व चैंपियन आमिर खान है युवा मुक्केबाजों के लिए प्रेरणा का स्रोत

विश्र्व चैंपियन आमिर खान ब्रिटिश मूल के मुक्केबाज़ जो मूल रूप से पाकिस्तानी हैं, उन्होंने हल ही में रिटायरमेन्ट की घोसणा कर यह साबित किया के किसी भी मुक्केबाज़ को अपने शासन का अंत कब और कैसे करना चाहिए, मुक्केबाज़ी में अपने 18 साल के करियर में उन्हें अपने भार वर्ग में दुनिया के सर्वश्रेष्ठ विरोधियों पर कई बड़ी जीत हासिल की, जब वह टॉप पर थे तब एक राजा की तरह दुनिया पर राज किया और जब रिटायरमेंट का समय आया तब चुप चाप निकल गए।

2009 और 2012 के बीच एकीकृत लाइट-वेलटरवेट विश्र्व चैंपियनशिप जीती, 2007 से 2008 तक लाइटवेट वर्ग में राष्ट्र मंडल का खिताब भी जीता, 2004 में जब वो शौकिया मुक्केबाज़ थे तब उन्होंने लाइटवेट वर्ग में रजक पदक जीता और ब्रिटेन के सबसे कम उम्र के मुक्केबाज़ी ओलम्पिक पदक विजेता बने, तब वह मात्र 17 साल के थे और फिर 22 साल की उम्र में डब्ल्यूबीऐ ख़ितािब जीतकर सबसे कम उम्र के ब्रिटिश पेशेवर वर्ल्ड चैंपियन बन गए।

2010 में दिल्ली में हुए राष्ट्र मंडल खेलो के दौरान आमिर खान के भाई हारुन खान, जो एक प्रसिद्ध मुक्केबाज़ रहे हैं उन्होंने ने यूके में बड़े होने क अपने अनुभव के बारे में बताया था, दोनों भाइयों का जन्म बोल्टन में हुआ था उन्होंने बताया के हमारे परिवार की जड़ें मतोर गांव से है जो रावलपिंडी जिले में स्थित है। और हमारे दादा जी जो की आज़ादी से पहले ही सेना की सेवा में थे, सेनावृत्ति के बाद यूके चले गए और इसी तरह हमारा परिवार ब्रिटेन आया और इंग्लैंड में बस गया तब तक हम बच्चे ही थे।

हारुन खान कहते हैं के मेरे भाई को और मुझे अक्सर बाधाओं का सामना करना पड़ता था हर स्तर पर बदमाशी और भेदभाव था हम एशियाई मूल के थे इसलिए, इन सब क बावजूद मेरे भाई आमिर खान ने बहुत ही कम उम्र में ही बॉक्सिंग में महारत हासिल करना शुरू कर दिया था।

हारुन कहते हैं मेरे भाई की सफलता को देख मैंने भी इस खेल को अपनाया और सफल भी हुआ लेकिन अपने भाई जितना नहीं, हम हमेशा सफाई से और नियमो की हिसाब से लड़ते हैं यूरोपिये मुक्केबाज़ कभी कभी ध्यान भटकने के लिए सर पर वॉर कर देते हैं हम दोनों ही भाइयों ने इस तरह की कोई हरकत नहीं की, मेरे भाई ने जो कुछ भी हासिल किया है उसपर मुझे वास्तव में गर्व है क वह एक मुक्केबाज़ है चालबाज़ नहीं।

हारुन बताते हैं के 2010 में हुई राष्ट्रमंडल खेलों के दौरान उदाहरण देते हुए बताया की तब ब्रिटिश मुक्केबाज़ अन्थोनी औगोगो (जिनकी माँ ब्रिटिश हैं और पिता नाइजीरियन) ने भारत के स्टार मुक्केबाज़ विजेंदर सिंह को धोका दिया,
भरिये मुक्केबाज़ जो उस समय नंबर एक थे ओगोगो उन्हें एक भी मुक्का मरने में असफल रहा लेकिन उसने विजेंदर सिंह से दो फ़ाउल करने लिए धोका दिया जिससे उनके नंबर काट लिए गए और ओगोगो को विजेता घोषित कर दिया गया,
आमिर खान ब्रिटेन में पैदा हुए पाले बढ़े और मुक्केबाज़ी सीखी इसलिए वह यूरोपिये मुक्केबाज़ों द्वरा इस्तेमाल की जाने वाली चालों के बारे में अच्छे से जानते थे।

उन्होंने मात्र 11 साल की उम्र से ही मुक्केबाज़ी स्पर्धाओं में भाग लेना शुरू कर दिया था उनकी पहली महत्पूर्ण जीत , तीन अंग्रेजी स्कूल ख़िताब, तीन जूनियर ऐमेच्योर बॉक्सिंग असोसिएसन ख़िताब, और 2003 जूनियर ओलम्पिक में एक स्वर्ण पदक है और 2004 में उन्होंने दक्षिण कोरिआ विश्र्व जूनियर लाइट वेट खिताब जीता कुल मिला कर उनका 101 जीत और केवल 9 हर का अद्भुत रिकॉर्ड था।

2004 के ओलम्पिक में उन्होंने क्यूबा के मुक्केबाज़ मारिओ किन्डेलन से कड़ी लड़ाई के बाद रजक पदक मिला बाद में एक और प्रतियोगिता में उन्होंने किन्डेलन को हराया और इसके तुरंत बाद वह अपनी शौकिया स्थिति से बाहेर निकल कर एक पेशेवर मुक्केबाज़ बन गए। आमिर खान नीचे से उठे और ऊपर तक मजबूती से अपनी लड़ाई लड़ी उनकी पेशेवर मुक्केबाज़ के रूप में 40 में से 34 मुकाबले जीते और मात्र 6 ही हारे हैं।

आमिर खान ने मुक्केबाज़ों को प्रशिक्षित करने के लिए इस्लामाबाद में एक अकादमी की स्थापना की है लेकिन एशियाई मुक्केबाज़ अक्सर यूरोपिये मुक्केबाज़ों की तरह सफल क्यों नहीं होते इसके जवाब में आमिर खान ने मेडिओ को बताय के एशियाई आहार भयावह है चपाती और कढ़ी चैंपियन खिलाडी पैदा नहीं कर सकते बचपन से ही उनकी डाईट में प्रोटीन ज़्यादा और फैट कम होती है मेरा सौभाग्य था के जब मैंने शुरुआत की तब मैं बहुत छोटा था।

आमिर कहते हैं के ये अकेले आहार नहीं है हमे ऐसे रोल मॉडल की ज़रूरत है जिनका युवा अनुसरण कर सके हमे आने वाेरित करने केलिए और अधिक मुक्केबाज़ों की ज़रूरत है, अब युवाओं को चाहिए की आमिर खान क नक़्शेक़दम पर चलना है और उनके मुक़ाम तक पहुंचना है जो उन्होंने हासिल किया है।

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